Month: November 2018

It Still Rains Here

“It still rains here
Though you left me, long ago.
I still relish the drops,
On my fingers, my hands, my face, my neck
And everything, that was once, yours.
The pain you left me in, still exists.
But why should I grieve?
If that was what you desired to give me.

It still rains here.
The windows remain shut.
The roof leaks. The walls keep wet.
But I don’t smell moist.
Your fragrance still persists.
The smell of your sweat on the collar,
The smell of your hanky…

Do you remember the lane behind Sun City?
As the clouds capped the stars and the moon
And there was a catalyst zephyr,
You walked close to me.
The toxic aroma of cigarette that still lingered on your breath…
It was killing me. But I gave in.

I held you by your collar.

And that stroke of your stubbled cheeks on my neck…
I was young. And my skin was tender.

And so were, my hands that ran down your navel.

It still rains here.
Now, I have my own five O’clock shadow.
I still feel your tongue rolling in my mouth.
I swallow my saliva as I suck my lips.
My hands are now rugged.

How I wish, I could apologize for that collar that I ripped.
The lips were sealed.
They were wet, wrinkled and red. And so were yours.
And I still hold that button that fell apart.

And one fine day…
You decided to walk away. Just like that. Just.
I stood like a fool and see you lose to the crowds.
That’s all I could do then. Stand like a fool…

I feel sorry for my country and my country men.

It still rains here. Just so you know.”

Posted by Prashant Bhilare in By Author, By Genre, By Language, By Title, English, Poem / Poetry, 3 comments

Unexpected life

It’s 1am and you’re trying to sleep but no sleeps comes since your mind is too occupied with unwanted thoughts

It’s 2am and you’re crying your heart out because everyone who was supposed to stay, they all left you too soon.

It’s 3am and you’re holding a blade in your hand because its the only way you know to ease the pain in your heart.

It’s 4am and the only thing you can see is your scarlet wrists and the only thing you can hear is the sound of crimson liquid falling on the floor.

It’s 5am and you’re in shower, thinking about everything that’s wrong with your life.

It’s 6am and you’re eating your breakfast even though you don’t want to.

It’s 7am and you’re waiting at the bus stop and thinking about those days when your dad used to drop you to school

It’s 8am and you’re surrounded with people you’ve known your whole life and still haven’t really known.

It’s 9am and you’re standing in a ground with your hands folded and praying to someone you’re not sure if exist or not.

It’s 10am and you’re looking at trigonometric identities without really understanding anything.

It’s 11am and you’re laughing with bunch of people who are too ignorant to see the empty look in your eyes.

It’s 12pm and you’re trying to understand principles of inheritance and variation.

It’s 1pm and you’re wishing you were at your home instead of being trapped in this hellhole called school

It’s 2pm and you’re walking on the road alone and thinking about that time when your mom used to pick up from school everyday

It’s 3pm and you’re doing your homework and trying to be a good kid even though you know it’s of no use because no one is going to see how much you’re trying to full fill their expectations.

It’s 4pm and you’re looking at the computer screen waiting for that one message that’ll never come.

It’s 5pm and you are listening to songs that make you want to cry but at the same time give you some strength to keep going.

It’s 6 pm and you’re once again busy with your books, trying to ignore the world.

It’s 7pm and you hear the doorbell.

It’s 8pm and you’re trying to ignore the feeling of running away.

It’s 9pm and you’re sitting in your room, A bit scared of what’ll happen tonight.

It’s 10pm and now you can hear shouts and cries. You hear your parents arguing but you stay quite because you know what’s going to happen next.

It’s 11 pm and there is a loud knock on your bedroom door.

It’s 12am and you’re sitting with belt marks all over your skin. You’re scared and alone. You’ve got no one to protect you, to save you. You’ve got no one to confide in. You’ve got no one who’ll kiss on your scars. You’ve got no one who’ll wipe away your tears. The only thing you’ve got is the bunch of the people who call themselves your friend while they even don’t know your reality. All you’ve got is yourself. All you’ve got is those scars and the feelings of not belonging. All you’ve got is pain in your heart and unwanted thoughts in your mind.

And then it all keeps repeating until you give up one day than everyone is suddenly crying because you’re no longer here. People who bullied you in school are telling other of how much of an amazing you were. Everyone is blaming you for being a coward. But no one is feeling guilty of their ignorance of their cruelty.

After a month, you’re forgotten. You’re just a name engraved on stone and erased from hearts.

But somewhere someone cries. You look at them from up above and feel nothing but pity for them. And then you see another life getting destroyed.

Yes, this is the cycle of life. Yes, this is destiny.

Posted by Samay Singh in By Author, By Genre, By Language, By Title, Comedy / Satire, English, 5 comments

ग्लानि – Part 1

आज वो बहुत परेशान था। उसे बार बार वो दिन याद आ रहा था जब वो गीता से शादी कर अपनी एक नयी दुनिया बनायी थी। लेकिन आज उनके तलाक़ की सुनवाई होने जा रही है। आख़िर इन तीन सालों में ऐसा क्या हो गया जो ये नौबत आ गयी। वो आज भी गीता से उतना ही प्यार करता है। अफ़सोस…

‘श्याम श्याम’ पापा आवाज़ लगते हुए घर में आए। मैं अपने कमरे से बाहर आया। पापा बहुत ख़ुश दिख रहे थे – उन्होंने मेरे सामने एक तस्वीर रख दी। ‘देख कितना अच्छा रिश्ता आया है। लड़की का नाम गीता है और वो एक एरहोस्टिस है।’ मैंने धीरे से फ़ोटो उठायी। गीता बहुत ही सुंदर थी। ख़ासतौर से उसकी आँखें जो हिरन जैसी ख़ूबसूरत थीं। मैंने अपनी ख़ुशी छुपाते हुए सिर्फ़ अपनी गर्दन ऐसे हिलायी मानो अभी मुझे शादी न करनी हो।

तभी रसोई से कल्याणी बाहर आयी। वैसे तो कल्याणी मेरे माँ समान थीं। वो मेरे पिता की दूसरी बीवी थी। वो पिता जी से उम्र में बहुत छोटी थीं। जब मेरे पिता ने उनसे शादी की थी तब मुझे बड़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। स्कूल में तो मेरा जीना मुश्किल हो गया था। ‘तेरे पापा ने तो मस्त माल घर लाए हैं, कभी हमें भी मौक़ा दो, तुम्हारे पापा तो बहुत ऊँची चीज़ निकले, जैसी भद्दी बातें सुन कर मेरा मन बहुत दुखी हो जाता था। सारा दिन पापा को कोसता रहता और कल्याणी को भी जी भर के गालियाँ देता। उसे कभी माँ का दर्जा ना दे सका। पापा की दूसरी शादी की वजह से रिश्तेदार और मोहल्ले वाले धीरे धीरे हमसे दूरी बढ़ा ली। मैं बाहर खेलने जाना भी कम कर दिया था। लोगों से डर लगने लगा। मेरा आत्मविश्वास, मेरी हँसी, मेरा चहकना सब बंद हो गया था। पढ़ाई में भी मन नहीं लगता। मेरे ग्रेड्ज़ गिर गए। पापा परेशान हुए। कल्याणी से बात करके मुझे हॉस्टल में भेजने का फ़ैसला किया। मुझे पापा से दूर भेजने की साज़िश कल्याणी की ही थी। मुझे उससे बहुत चिढ़ हो गयी थी। अगर वो मुझसे बात करने की कोशिश करती तो मैं छिड़क देता। उसके किसी भी बात का ठीक से जवाब नहीं देता। लेकिन कभी कभी मैं उसको छुप करके देखता था। ग़ज़ब का सौंदर्य था उसका। उसकी आँखें, उसकी मुस्कुराहट, उसकी होंठ – ऐसा लगता था मानो वही मेनका है। मेरे पापा को अपने जाल में फँसना उसका मक़सद था। बावजूद इसके मेरे मन में ख़्याल आता की मैं भी इतनी ख़ूबसूरत औरत से शादी करूँगा।

To be continued

Posted by Yadavendra Singh in By Author, By Genre, By Language, By Title, Fiction, Hindi, 0 comments

हमारी अधूरी कहानी

*हमारी अधूरी कहानी*
जवानी की दहलीज पर कदम पड़े ही थे l जिंदगी भी अजीब कश्मकश के दौर से गुजर रही थी l रह रह कर अपने ही अंदर सवालों के सैलाब उमड़ रहे थे, अजीब सा डर, अजीब सी बेचैनी थी l जहां क्लास के सभी साथी अब जोड़ियों में बटने लगे थे, फ्रेंडशिप डे के बजाय वैलेंटाइंस डे का इंतजार करने लगे थे, वही में खुद को खुद में ढूंढ रहा था l
मुझे हमेशा से ही बात पता थी कि मैं औरों उसे कुछ अलग हूं lपर अब उस अलग की परिभाषा समझ आने लगी थीl मेरा आकर्षण लड़कियों के बजाय लड़कों में था l
कुछ समझ नहीं आ रहा था खुद से कभी कभी घृणा सी होने लगती थी, मन ही मन ऊपर वाले को याद किया करता था और अपने आप को ठीक कर देने को कहता था l उन्हीं दिनों दिल्ली में आयोजित प्राइड वॉक के विषय में जानने को मिला, तब पता चला दुनिया में मैं अकेला नहीं समाज में मेरे जैसे हजारों लोग हैं, और यह लोग अलग नहीं बिल्कुल साधारण है हर साधारण व्यक्ति की तरह l अब मन कुछ शांत था, मानो तूफान से लड़ती हुई नौका को किनारा मिल चुका हो l अब मन सपने बुनने लगा था l
कुछ डेढ़ दो महीने बाद विद्यालय में वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित हुई, नियमानुसार प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र को नेशनल लेवल वाद विवाद प्रतियोगिता के लिए चुना जाना था l आवाज तो मेरी हमेशा से ही अच्छी थी, विद्यालय स्तर पर वाद विवाद प्रतियोगिता जितना मेरे लिए कोई मुश्किल नहीं था l
और वह समय आया जब मेरा राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता के लिए दिल्ली आना हुआ l
‌अनेकों युवाओं के बीच उस परिसर में मेरी नजर पड़ी मिश्रा जी पर जो लकड़ी की कुर्सी पर बैठ कर सबके लिए कमरे निर्धारित कर रहे थे, अपने कमरे का पता लेकर मैं सीधे पहुंचा अपने कमरे की ओर किसी भी बात का पूर्वानुमान ना होने के कारण झटके से दरवाजा खोलते हुए में अंदर दाखिल हुआ और एकदम स्तब्ध रह गया l मेरे सामने खड़ा था एक लंबा, आजान बाहु गेहुआ वर्ण तथा चमकीली आंखों वाला एक नवयुवक, तभी आवाज आई और मेरा ध्यान भंग हुआ, मेरी ओर हाथ बढ़ाते हुए उसने कहा, मेरा नाम है अथर्व मैं अंबाला का रहने वाला हूं, फिर एक छोटी सी हंसी हंसकर बोला अब 7 दिन तक तुमको परेशान करने आया हूं, मुझे भी यही कमरा मिला है l उसकी इस बात पर हम दोनों ही हंस पड़े और शुरु हुआ एक नई दोस्ती का रिश्ता…..
‌ देखते देखते 2 दिन बीते, मेरे मन में उसके लिए अजीब सी बेचैनी थी, उसका साथ मुझे अच्छा लग रहा था l उस दिन रात्रि भोजन के बाद हम दोनों वापस अपने कमरे में आए, उस दिन भारत और पाकिस्तान का मैच था l अथर्व की मैच में काफी रुचि थी वह कमरे में घुसते ही अपने मोबाइल पर लाइव मैच लगाकर बैठ गया l कुछ देर बीता ही था की वह मेरी तरफ देखा और बोला, ” मैच रोमांचक हो चला है, तुम देखना पसंद करोगे?” मेरी बचपन से खेलकूद में कोई रुचि नहीं रही पर मानो उसकी खुशी के लिए मेरा सर अपने आप ही हां कर गया l
मेरे हां भर की देरी थी कि वह आकर मेरे बगल में लेट गया l उसका शरीर मेरे शरीर से छूते ही मेरा माथा पसीने से तरबतर हो गया, जहां एक तरफ उसकी आंखें मोबाइल के स्क्रीन की ओर अपलक देख रही थी वही मेरी निगाहें एक टक उसके चेहरे की ओर देख रहे थे l दिल मानो धड़कनों में यह दुआएं कर रहा था की घड़ी का कांटा हमेशा के लिए यूंही रुक जाए और यह करीबी कभी दूरी ना बने l
तभी अचानक उसकी नजर, उसको देखते हुए मेरी नजरों पर पड़ी, मैं सहम उठा पलकें झुक गई, धड़कन है मानो मानो तीव्र गति से धड़कने लगी l वह शायद अब समझ चुका था कि मेरे दिल में उसके लिए कुछ था l
उसने फोन को बंद कर के बगल में रख दिया l
और मुझे जकड़ लिया अपनी बाहों में, और यूं ही हम रात भर एक दूसरे में डूबते चले गए l अधरपल्लव के रसास्वादन से अगले दिन की शुरुआत भी मीठी ही रही l
जागती हुई आंखें हजारों सपने देखने लगी l
यूं ही 7 दिन का सफर खत्म हो चला था, अश्रुपूर्ण आंखों को समझाते हुए अब विदा लेनी थी l
‌ मैं अथर्व के पास गया और उसे ज़ोर से गले लगा लिया l इस समय को मैं खत्म होने नहीं देना चाहता था l कि तभी अचानक मुझे पीछे धकेलते हुए, वह बोला कि मैं ऐसा बर्ताव कर रहा हूं जैसे कि उसकी पत्नी यां प्रेमिका हो l मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही उसके शब्द यह जता चुके थे कि पिछले 4 दिनों में मेरे साथ बिताया हुआ समय उसके जीवन में कोई अहमियत नहीं रखते और वह मात्र शारीरिक सुखों को भोगने के लिए था मैं मौन खड़ा सब सुनता रहा l
‌ अपनी बात कहकर व चल चल पड़ा, अब हमारे रास्ते अलग हो चुके थे l उसके कमरे से निकलते ही, मेरा भी उस कमरे में दम घुटने सा लगा उसके साथ बिताए हुए पल उस कमरे की यादें आंखों के सामने घूमने लगी l मैं घर लौट आया आज इस बात को 7 साल 4 महीने 17 दिन हो चुके हैं पर आज भी मेरा दिल अपने उस पहले प्यार की पहली याद को संजोए बैठा है l कितना मुश्किल है भुला पाना, की अधूरी है मेरी प्रेम कहानी l और ना जाने हम जैसे लोगों के जीवन में ऐसी कितनी ही अधूरी कहानियां होती हैं जो दिल के कोनों में हमेशा के लिए दबी रहती हैं l
समझते अगर हमें भी प्यार के काबिल तुम तो जान पाते किस कदर चाहते थे तुम्हें l पर जाओ आजाद हो तुम बार बार हमारा दिल तोड़ने के लिए, बार-बार हमारे करीब आकर हमसे दूर जाने के लिए l क्योंकि हमने भी समझौता कर लिया अपनी अधूरी कहानी से l
– रित्विक

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और फ़ोन पर एक नम्बर दिखा – वो कोई रैंडम नम्बर नहीं था। मैंने कई बार ये नम्बर देखा था। इससे पहले कुछ स्क्रीन्शॉट्स और कुछ कॉन्फ़्रेन्स कॉल्ज़ जहाँ मैंने कुछ बोला नहीं था वहाँ भी।

थोड़ा अजीब लगा लेकिन मैंने फ़ोन उठा ही लिया। ‘हेलो, कौन??’ उसको उसकी जिस्मानी बनावट से ले कर उसकी आदत-इबादत तक जान लेने के बाद भी मैंने पूछा – कौन? दूसरी तरफ़ से तेज़ आँधी सी सांसें और एक बचकानी सी भोली सी आवाज़ आयी – आप हमको नहीं जानते। पर हमको जानते हैं बहुत अच्छे से। पूरा पूरा दिन आपका ही की बातें बतियाते रहते हैं। मेरे होंठों ने मुस्कुराना बेहतर समझा। आँखों ने पलकें मूँद कर उस तारीफ़ के सदके में उस मासूम को दुआएँ दीं। मैंने ख़ुद को सम्भाला। अरे तुम… कविता बोल रही हो क्या? कैसी हो? दिवाकर कहाँ है? घर में सब कैसे हैं। इतने सवाल पूछ लिए ताकि वो अपनी बात से भटक जाए। और मैं भी बच जाऊँ।  पर आज वो मूड बना कर बैठी थी। बातों को किसी फ़ास्ट बोलर सी कैच करती हुए बोली –  बाक़ी सब तो बढ़िया हैं बस यही बहुत बदल गए हैं। आप बोले थे ना की बताना अगर कोई परेशान करे तो इसीलिए फ़ोन किया है। अब मैं संजीदा होने का दिखावा किया। वो जो बदल गया उसको मैंने ही बरबाद किया है। दिल से अचानक एक चीख़ निकली पर इससे पहले होंठों तक आती आँसू आ गए। क्या हुआ? – मैंने डरते हुए पूछा।  उसने फिर तीर चलाया – शादी का दिन आने वाला है। ना दाढ़ी बनवा रहे हैं और ना ही हमसे बातें कर रहे हैं। ना हँसते हैं और ना ही भाव देते हैं।  सब कोट पैंट इनकी अम्मा लोग ले आए हैं और हमारी पसंद का कुछ नहीं लिया है। हम बता रहे हैं जो अगर यही भेष बनाए रहेंगे तो हम मंडप पर से चले जाएँगे और फिर बिना औरत के कौन सा विवाह होगा देखेंगे।

उसका गला भर आया। शायद रो रही होगी। मैंने धीरे से कहा – दिवाकर को फ़ोन दो। वो फ़ोन देकर चली गयी। शायद अपने होने वाले पति के सामने रोना नहीं चाहती थी। तक़रीबन दस मिनट तक दोनो तरफ़ ख़ामोशी रही। फिर अचानक कुछ गिरने की आवाज़ आयी। मैंने सही मौक़ा देख कर बात शुरू की। ‘क्या गिरा’? वो बोला ग्लास। मैंने तो यूँही पूछा था पर उसने बात पकड़ लिया। मैंने पूछा टूटा तो नहीं? वो बोला तुम्हें क्या लगता है इतनी जल्दी टूट जाएगा। अभी बहुत जान बाक़ी है। अभी तो बहुत तमाशा देखना बाक़ी है बाबू। मैंने नज़रंदाज़ करने की पूरी कोशिश की। कविता को क्यूँ परेशान कर रहे हो? कुछ चुटकी लेते हुए मैंने बोला इतनी शेखी मारोगे तो बहुत घाटा सहोगे शादी के बाद। वो तो अभी भी सह रहे हैं और आगे भी सहेंगे। तुम को जो खो दिया है हमने – वो बोला।

मैंने बोला – खो दिया कि अपनाया नहीं? इतनी हिम्मत होती तो हमको भगा ना ले जातेहॉस्टल से? तुमको को पटा है यार ये सब नहीं हो पाएगा हमसे। हम दुखी नहीं हैं पर अब उसकी तरह हमको पहले प्यार से ब्याहना नहीं है ना इसीलिए ज़्यादा ख़ुशी नहीं है।थोड़ा समय लगेगा फिर सब सही हो जाएगा। ये भी शांत हो जाएगी। अभी कुछ साल तक भूत तो रहेगा ना। मैंने बीच में ही पूछा – क्यूँ तुम उसको प्यार नहीं करोगे क्या? वो बोला करेंगे ना, शादी, बच्चे, प्यार सब करेंगे। पर शायद वैसा नहीं जैसे हॉस्टल की सर्दी की रातों में रज़ाई में हमने साथ में सोचा था।

अब ये बस के बाहर जा रहा था। तो मत करो ना, अभी भी देर नहीं हुई है। हम अभी भी वहीं खड़े हैं जहाँ तुम पलट कर गए थे। कविता अच्छी लड़की है, मिल जाएगा उसको भी कोई अच्छा लड़का। वो बोला ना अब तो अम्मा बाबूजी की इज़्ज़त की बात है। शादी तो होगी। मैं घरवालों को धोखा नहीं दे सकता। मैंने तपाक से पूछा – और तुम खद को जो धोखा दे रहे हो? वो रो दिया। क्या करे बाबू हम तो मरने जा रहे थे फिर अम्मा बाबूजी का ख़्याल आया तो सोचा कि शादी ही कर लूँ। दोनो एक ही बात है। पर अच्छा है तुम पूरे सफ़र टूटे नहीं। तुम आना ज़रूर शादी में। अकेले ज़लील होने में मज़ा नहीं आ रहा है।

मैंने अपने आसुओं को आज़ाद कर दिया। कपकपाते होंठों से बस इतना ही निकला – ठीक है, कोशिश करूँगा।

कुछ दिन हो गए ये सब कहानी को। अब जाना है है अपनी मुहब्बत की शादी में।

Posted by Barkat in By Author, By Genre, By Language, By Title, English, Fiction, 5 comments