#After377

 

और फ़ोन पर एक नम्बर दिखा – वो कोई रैंडम नम्बर नहीं था। मैंने कई बार ये नम्बर देखा था। इससे पहले कुछ स्क्रीन्शॉट्स और कुछ कॉन्फ़्रेन्स कॉल्ज़ जहाँ मैंने कुछ बोला नहीं था वहाँ भी।

थोड़ा अजीब लगा लेकिन मैंने फ़ोन उठा ही लिया। ‘हेलो, कौन??’ उसको उसकी जिस्मानी बनावट से ले कर उसकी आदत-इबादत तक जान लेने के बाद भी मैंने पूछा – कौन? दूसरी तरफ़ से तेज़ आँधी सी सांसें और एक बचकानी सी भोली सी आवाज़ आयी – आप हमको नहीं जानते। पर हमको जानते हैं बहुत अच्छे से। पूरा पूरा दिन आपका ही की बातें बतियाते रहते हैं। मेरे होंठों ने मुस्कुराना बेहतर समझा। आँखों ने पलकें मूँद कर उस तारीफ़ के सदके में उस मासूम को दुआएँ दीं। मैंने ख़ुद को सम्भाला। अरे तुम… कविता बोल रही हो क्या? कैसी हो? दिवाकर कहाँ है? घर में सब कैसे हैं। इतने सवाल पूछ लिए ताकि वो अपनी बात से भटक जाए। और मैं भी बच जाऊँ।  पर आज वो मूड बना कर बैठी थी। बातों को किसी फ़ास्ट बोलर सी कैच करती हुए बोली –  बाक़ी सब तो बढ़िया हैं बस यही बहुत बदल गए हैं। आप बोले थे ना की बताना अगर कोई परेशान करे तो इसीलिए फ़ोन किया है। अब मैं संजीदा होने का दिखावा किया। वो जो बदल गया उसको मैंने ही बरबाद किया है। दिल से अचानक एक चीख़ निकली पर इससे पहले होंठों तक आती आँसू आ गए। क्या हुआ? – मैंने डरते हुए पूछा।  उसने फिर तीर चलाया – शादी का दिन आने वाला है। ना दाढ़ी बनवा रहे हैं और ना ही हमसे बातें कर रहे हैं। ना हँसते हैं और ना ही भाव देते हैं।  सब कोट पैंट इनकी अम्मा लोग ले आए हैं और हमारी पसंद का कुछ नहीं लिया है। हम बता रहे हैं जो अगर यही भेष बनाए रहेंगे तो हम मंडप पर से चले जाएँगे और फिर बिना औरत के कौन सा विवाह होगा देखेंगे।

उसका गला भर आया। शायद रो रही होगी। मैंने धीरे से कहा – दिवाकर को फ़ोन दो। वो फ़ोन देकर चली गयी। शायद अपने होने वाले पति के सामने रोना नहीं चाहती थी। तक़रीबन दस मिनट तक दोनो तरफ़ ख़ामोशी रही। फिर अचानक कुछ गिरने की आवाज़ आयी। मैंने सही मौक़ा देख कर बात शुरू की। ‘क्या गिरा’? वो बोला ग्लास। मैंने तो यूँही पूछा था पर उसने बात पकड़ लिया। मैंने पूछा टूटा तो नहीं? वो बोला तुम्हें क्या लगता है इतनी जल्दी टूट जाएगा। अभी बहुत जान बाक़ी है। अभी तो बहुत तमाशा देखना बाक़ी है बाबू। मैंने नज़रंदाज़ करने की पूरी कोशिश की। कविता को क्यूँ परेशान कर रहे हो? कुछ चुटकी लेते हुए मैंने बोला इतनी शेखी मारोगे तो बहुत घाटा सहोगे शादी के बाद। वो तो अभी भी सह रहे हैं और आगे भी सहेंगे। तुम को जो खो दिया है हमने – वो बोला।

मैंने बोला – खो दिया कि अपनाया नहीं? इतनी हिम्मत होती तो हमको भगा ना ले जातेहॉस्टल से? तुमको को पटा है यार ये सब नहीं हो पाएगा हमसे। हम दुखी नहीं हैं पर अब उसकी तरह हमको पहले प्यार से ब्याहना नहीं है ना इसीलिए ज़्यादा ख़ुशी नहीं है।थोड़ा समय लगेगा फिर सब सही हो जाएगा। ये भी शांत हो जाएगी। अभी कुछ साल तक भूत तो रहेगा ना। मैंने बीच में ही पूछा – क्यूँ तुम उसको प्यार नहीं करोगे क्या? वो बोला करेंगे ना, शादी, बच्चे, प्यार सब करेंगे। पर शायद वैसा नहीं जैसे हॉस्टल की सर्दी की रातों में रज़ाई में हमने साथ में सोचा था।

अब ये बस के बाहर जा रहा था। तो मत करो ना, अभी भी देर नहीं हुई है। हम अभी भी वहीं खड़े हैं जहाँ तुम पलट कर गए थे। कविता अच्छी लड़की है, मिल जाएगा उसको भी कोई अच्छा लड़का। वो बोला ना अब तो अम्मा बाबूजी की इज़्ज़त की बात है। शादी तो होगी। मैं घरवालों को धोखा नहीं दे सकता। मैंने तपाक से पूछा – और तुम खद को जो धोखा दे रहे हो? वो रो दिया। क्या करे बाबू हम तो मरने जा रहे थे फिर अम्मा बाबूजी का ख़्याल आया तो सोचा कि शादी ही कर लूँ। दोनो एक ही बात है। पर अच्छा है तुम पूरे सफ़र टूटे नहीं। तुम आना ज़रूर शादी में। अकेले ज़लील होने में मज़ा नहीं आ रहा है।

मैंने अपने आसुओं को आज़ाद कर दिया। कपकपाते होंठों से बस इतना ही निकला – ठीक है, कोशिश करूँगा।

कुछ दिन हो गए ये सब कहानी को। अब जाना है है अपनी मुहब्बत की शादी में।

4 comments

Wao… Sooo lovely… I love to read you… This is something which is so full of feelings, and it’s like mirror, so clear! Just Wao.

Super n emotional story…

It’s truly emotional story rona aa gya

plz write in english.i m a tgirl.

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