Fiction

ग्लानि – Part 1

आज वो बहुत परेशान था। उसे बार बार वो दिन याद आ रहा था जब वो गीता से शादी कर अपनी एक नयी दुनिया बनायी थी। लेकिन आज उनके तलाक़ की सुनवाई होने जा रही है। आख़िर इन तीन सालों में ऐसा क्या हो गया जो ये नौबत आ गयी। वो आज भी गीता से उतना ही प्यार करता है। अफ़सोस…

‘श्याम श्याम’ पापा आवाज़ लगते हुए घर में आए। मैं अपने कमरे से बाहर आया। पापा बहुत ख़ुश दिख रहे थे – उन्होंने मेरे सामने एक तस्वीर रख दी। ‘देख कितना अच्छा रिश्ता आया है। लड़की का नाम गीता है और वो एक एरहोस्टिस है।’ मैंने धीरे से फ़ोटो उठायी। गीता बहुत ही सुंदर थी। ख़ासतौर से उसकी आँखें जो हिरन जैसी ख़ूबसूरत थीं। मैंने अपनी ख़ुशी छुपाते हुए सिर्फ़ अपनी गर्दन ऐसे हिलायी मानो अभी मुझे शादी न करनी हो।

तभी रसोई से कल्याणी बाहर आयी। वैसे तो कल्याणी मेरे माँ समान थीं। वो मेरे पिता की दूसरी बीवी थी। वो पिता जी से उम्र में बहुत छोटी थीं। जब मेरे पिता ने उनसे शादी की थी तब मुझे बड़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। स्कूल में तो मेरा जीना मुश्किल हो गया था। ‘तेरे पापा ने तो मस्त माल घर लाए हैं, कभी हमें भी मौक़ा दो, तुम्हारे पापा तो बहुत ऊँची चीज़ निकले, जैसी भद्दी बातें सुन कर मेरा मन बहुत दुखी हो जाता था। सारा दिन पापा को कोसता रहता और कल्याणी को भी जी भर के गालियाँ देता। उसे कभी माँ का दर्जा ना दे सका। पापा की दूसरी शादी की वजह से रिश्तेदार और मोहल्ले वाले धीरे धीरे हमसे दूरी बढ़ा ली। मैं बाहर खेलने जाना भी कम कर दिया था। लोगों से डर लगने लगा। मेरा आत्मविश्वास, मेरी हँसी, मेरा चहकना सब बंद हो गया था। पढ़ाई में भी मन नहीं लगता। मेरे ग्रेड्ज़ गिर गए। पापा परेशान हुए। कल्याणी से बात करके मुझे हॉस्टल में भेजने का फ़ैसला किया। मुझे पापा से दूर भेजने की साज़िश कल्याणी की ही थी। मुझे उससे बहुत चिढ़ हो गयी थी। अगर वो मुझसे बात करने की कोशिश करती तो मैं छिड़क देता। उसके किसी भी बात का ठीक से जवाब नहीं देता। लेकिन कभी कभी मैं उसको छुप करके देखता था। ग़ज़ब का सौंदर्य था उसका। उसकी आँखें, उसकी मुस्कुराहट, उसकी होंठ – ऐसा लगता था मानो वही मेनका है। मेरे पापा को अपने जाल में फँसना उसका मक़सद था। बावजूद इसके मेरे मन में ख़्याल आता की मैं भी इतनी ख़ूबसूरत औरत से शादी करूँगा।

To be continued

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हमारी अधूरी कहानी

*हमारी अधूरी कहानी*
जवानी की दहलीज पर कदम पड़े ही थे l जिंदगी भी अजीब कश्मकश के दौर से गुजर रही थी l रह रह कर अपने ही अंदर सवालों के सैलाब उमड़ रहे थे, अजीब सा डर, अजीब सी बेचैनी थी l जहां क्लास के सभी साथी अब जोड़ियों में बटने लगे थे, फ्रेंडशिप डे के बजाय वैलेंटाइंस डे का इंतजार करने लगे थे, वही में खुद को खुद में ढूंढ रहा था l
मुझे हमेशा से ही बात पता थी कि मैं औरों उसे कुछ अलग हूं lपर अब उस अलग की परिभाषा समझ आने लगी थीl मेरा आकर्षण लड़कियों के बजाय लड़कों में था l
कुछ समझ नहीं आ रहा था खुद से कभी कभी घृणा सी होने लगती थी, मन ही मन ऊपर वाले को याद किया करता था और अपने आप को ठीक कर देने को कहता था l उन्हीं दिनों दिल्ली में आयोजित प्राइड वॉक के विषय में जानने को मिला, तब पता चला दुनिया में मैं अकेला नहीं समाज में मेरे जैसे हजारों लोग हैं, और यह लोग अलग नहीं बिल्कुल साधारण है हर साधारण व्यक्ति की तरह l अब मन कुछ शांत था, मानो तूफान से लड़ती हुई नौका को किनारा मिल चुका हो l अब मन सपने बुनने लगा था l
कुछ डेढ़ दो महीने बाद विद्यालय में वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित हुई, नियमानुसार प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र को नेशनल लेवल वाद विवाद प्रतियोगिता के लिए चुना जाना था l आवाज तो मेरी हमेशा से ही अच्छी थी, विद्यालय स्तर पर वाद विवाद प्रतियोगिता जितना मेरे लिए कोई मुश्किल नहीं था l
और वह समय आया जब मेरा राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता के लिए दिल्ली आना हुआ l
‌अनेकों युवाओं के बीच उस परिसर में मेरी नजर पड़ी मिश्रा जी पर जो लकड़ी की कुर्सी पर बैठ कर सबके लिए कमरे निर्धारित कर रहे थे, अपने कमरे का पता लेकर मैं सीधे पहुंचा अपने कमरे की ओर किसी भी बात का पूर्वानुमान ना होने के कारण झटके से दरवाजा खोलते हुए में अंदर दाखिल हुआ और एकदम स्तब्ध रह गया l मेरे सामने खड़ा था एक लंबा, आजान बाहु गेहुआ वर्ण तथा चमकीली आंखों वाला एक नवयुवक, तभी आवाज आई और मेरा ध्यान भंग हुआ, मेरी ओर हाथ बढ़ाते हुए उसने कहा, मेरा नाम है अथर्व मैं अंबाला का रहने वाला हूं, फिर एक छोटी सी हंसी हंसकर बोला अब 7 दिन तक तुमको परेशान करने आया हूं, मुझे भी यही कमरा मिला है l उसकी इस बात पर हम दोनों ही हंस पड़े और शुरु हुआ एक नई दोस्ती का रिश्ता…..
‌ देखते देखते 2 दिन बीते, मेरे मन में उसके लिए अजीब सी बेचैनी थी, उसका साथ मुझे अच्छा लग रहा था l उस दिन रात्रि भोजन के बाद हम दोनों वापस अपने कमरे में आए, उस दिन भारत और पाकिस्तान का मैच था l अथर्व की मैच में काफी रुचि थी वह कमरे में घुसते ही अपने मोबाइल पर लाइव मैच लगाकर बैठ गया l कुछ देर बीता ही था की वह मेरी तरफ देखा और बोला, ” मैच रोमांचक हो चला है, तुम देखना पसंद करोगे?” मेरी बचपन से खेलकूद में कोई रुचि नहीं रही पर मानो उसकी खुशी के लिए मेरा सर अपने आप ही हां कर गया l
मेरे हां भर की देरी थी कि वह आकर मेरे बगल में लेट गया l उसका शरीर मेरे शरीर से छूते ही मेरा माथा पसीने से तरबतर हो गया, जहां एक तरफ उसकी आंखें मोबाइल के स्क्रीन की ओर अपलक देख रही थी वही मेरी निगाहें एक टक उसके चेहरे की ओर देख रहे थे l दिल मानो धड़कनों में यह दुआएं कर रहा था की घड़ी का कांटा हमेशा के लिए यूंही रुक जाए और यह करीबी कभी दूरी ना बने l
तभी अचानक उसकी नजर, उसको देखते हुए मेरी नजरों पर पड़ी, मैं सहम उठा पलकें झुक गई, धड़कन है मानो मानो तीव्र गति से धड़कने लगी l वह शायद अब समझ चुका था कि मेरे दिल में उसके लिए कुछ था l
उसने फोन को बंद कर के बगल में रख दिया l
और मुझे जकड़ लिया अपनी बाहों में, और यूं ही हम रात भर एक दूसरे में डूबते चले गए l अधरपल्लव के रसास्वादन से अगले दिन की शुरुआत भी मीठी ही रही l
जागती हुई आंखें हजारों सपने देखने लगी l
यूं ही 7 दिन का सफर खत्म हो चला था, अश्रुपूर्ण आंखों को समझाते हुए अब विदा लेनी थी l
‌ मैं अथर्व के पास गया और उसे ज़ोर से गले लगा लिया l इस समय को मैं खत्म होने नहीं देना चाहता था l कि तभी अचानक मुझे पीछे धकेलते हुए, वह बोला कि मैं ऐसा बर्ताव कर रहा हूं जैसे कि उसकी पत्नी यां प्रेमिका हो l मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही उसके शब्द यह जता चुके थे कि पिछले 4 दिनों में मेरे साथ बिताया हुआ समय उसके जीवन में कोई अहमियत नहीं रखते और वह मात्र शारीरिक सुखों को भोगने के लिए था मैं मौन खड़ा सब सुनता रहा l
‌ अपनी बात कहकर व चल चल पड़ा, अब हमारे रास्ते अलग हो चुके थे l उसके कमरे से निकलते ही, मेरा भी उस कमरे में दम घुटने सा लगा उसके साथ बिताए हुए पल उस कमरे की यादें आंखों के सामने घूमने लगी l मैं घर लौट आया आज इस बात को 7 साल 4 महीने 17 दिन हो चुके हैं पर आज भी मेरा दिल अपने उस पहले प्यार की पहली याद को संजोए बैठा है l कितना मुश्किल है भुला पाना, की अधूरी है मेरी प्रेम कहानी l और ना जाने हम जैसे लोगों के जीवन में ऐसी कितनी ही अधूरी कहानियां होती हैं जो दिल के कोनों में हमेशा के लिए दबी रहती हैं l
समझते अगर हमें भी प्यार के काबिल तुम तो जान पाते किस कदर चाहते थे तुम्हें l पर जाओ आजाद हो तुम बार बार हमारा दिल तोड़ने के लिए, बार-बार हमारे करीब आकर हमसे दूर जाने के लिए l क्योंकि हमने भी समझौता कर लिया अपनी अधूरी कहानी से l
– रित्विक

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#After377

 

और फ़ोन पर एक नम्बर दिखा – वो कोई रैंडम नम्बर नहीं था। मैंने कई बार ये नम्बर देखा था। इससे पहले कुछ स्क्रीन्शॉट्स और कुछ कॉन्फ़्रेन्स कॉल्ज़ जहाँ मैंने कुछ बोला नहीं था वहाँ भी।

थोड़ा अजीब लगा लेकिन मैंने फ़ोन उठा ही लिया। ‘हेलो, कौन??’ उसको उसकी जिस्मानी बनावट से ले कर उसकी आदत-इबादत तक जान लेने के बाद भी मैंने पूछा – कौन? दूसरी तरफ़ से तेज़ आँधी सी सांसें और एक बचकानी सी भोली सी आवाज़ आयी – आप हमको नहीं जानते। पर हमको जानते हैं बहुत अच्छे से। पूरा पूरा दिन आपका ही की बातें बतियाते रहते हैं। मेरे होंठों ने मुस्कुराना बेहतर समझा। आँखों ने पलकें मूँद कर उस तारीफ़ के सदके में उस मासूम को दुआएँ दीं। मैंने ख़ुद को सम्भाला। अरे तुम… कविता बोल रही हो क्या? कैसी हो? दिवाकर कहाँ है? घर में सब कैसे हैं। इतने सवाल पूछ लिए ताकि वो अपनी बात से भटक जाए। और मैं भी बच जाऊँ।  पर आज वो मूड बना कर बैठी थी। बातों को किसी फ़ास्ट बोलर सी कैच करती हुए बोली –  बाक़ी सब तो बढ़िया हैं बस यही बहुत बदल गए हैं। आप बोले थे ना की बताना अगर कोई परेशान करे तो इसीलिए फ़ोन किया है। अब मैं संजीदा होने का दिखावा किया। वो जो बदल गया उसको मैंने ही बरबाद किया है। दिल से अचानक एक चीख़ निकली पर इससे पहले होंठों तक आती आँसू आ गए। क्या हुआ? – मैंने डरते हुए पूछा।  उसने फिर तीर चलाया – शादी का दिन आने वाला है। ना दाढ़ी बनवा रहे हैं और ना ही हमसे बातें कर रहे हैं। ना हँसते हैं और ना ही भाव देते हैं।  सब कोट पैंट इनकी अम्मा लोग ले आए हैं और हमारी पसंद का कुछ नहीं लिया है। हम बता रहे हैं जो अगर यही भेष बनाए रहेंगे तो हम मंडप पर से चले जाएँगे और फिर बिना औरत के कौन सा विवाह होगा देखेंगे।

उसका गला भर आया। शायद रो रही होगी। मैंने धीरे से कहा – दिवाकर को फ़ोन दो। वो फ़ोन देकर चली गयी। शायद अपने होने वाले पति के सामने रोना नहीं चाहती थी। तक़रीबन दस मिनट तक दोनो तरफ़ ख़ामोशी रही। फिर अचानक कुछ गिरने की आवाज़ आयी। मैंने सही मौक़ा देख कर बात शुरू की। ‘क्या गिरा’? वो बोला ग्लास। मैंने तो यूँही पूछा था पर उसने बात पकड़ लिया। मैंने पूछा टूटा तो नहीं? वो बोला तुम्हें क्या लगता है इतनी जल्दी टूट जाएगा। अभी बहुत जान बाक़ी है। अभी तो बहुत तमाशा देखना बाक़ी है बाबू। मैंने नज़रंदाज़ करने की पूरी कोशिश की। कविता को क्यूँ परेशान कर रहे हो? कुछ चुटकी लेते हुए मैंने बोला इतनी शेखी मारोगे तो बहुत घाटा सहोगे शादी के बाद। वो तो अभी भी सह रहे हैं और आगे भी सहेंगे। तुम को जो खो दिया है हमने – वो बोला।

मैंने बोला – खो दिया कि अपनाया नहीं? इतनी हिम्मत होती तो हमको भगा ना ले जातेहॉस्टल से? तुमको को पटा है यार ये सब नहीं हो पाएगा हमसे। हम दुखी नहीं हैं पर अब उसकी तरह हमको पहले प्यार से ब्याहना नहीं है ना इसीलिए ज़्यादा ख़ुशी नहीं है।थोड़ा समय लगेगा फिर सब सही हो जाएगा। ये भी शांत हो जाएगी। अभी कुछ साल तक भूत तो रहेगा ना। मैंने बीच में ही पूछा – क्यूँ तुम उसको प्यार नहीं करोगे क्या? वो बोला करेंगे ना, शादी, बच्चे, प्यार सब करेंगे। पर शायद वैसा नहीं जैसे हॉस्टल की सर्दी की रातों में रज़ाई में हमने साथ में सोचा था।

अब ये बस के बाहर जा रहा था। तो मत करो ना, अभी भी देर नहीं हुई है। हम अभी भी वहीं खड़े हैं जहाँ तुम पलट कर गए थे। कविता अच्छी लड़की है, मिल जाएगा उसको भी कोई अच्छा लड़का। वो बोला ना अब तो अम्मा बाबूजी की इज़्ज़त की बात है। शादी तो होगी। मैं घरवालों को धोखा नहीं दे सकता। मैंने तपाक से पूछा – और तुम खद को जो धोखा दे रहे हो? वो रो दिया। क्या करे बाबू हम तो मरने जा रहे थे फिर अम्मा बाबूजी का ख़्याल आया तो सोचा कि शादी ही कर लूँ। दोनो एक ही बात है। पर अच्छा है तुम पूरे सफ़र टूटे नहीं। तुम आना ज़रूर शादी में। अकेले ज़लील होने में मज़ा नहीं आ रहा है।

मैंने अपने आसुओं को आज़ाद कर दिया। कपकपाते होंठों से बस इतना ही निकला – ठीक है, कोशिश करूँगा।

कुछ दिन हो गए ये सब कहानी को। अब जाना है है अपनी मुहब्बत की शादी में।

Posted by Barkat in By Author, By Genre, By Language, By Title, English, Fiction, 4 comments

Acceptance

‘Hey I am buying this pair of earrings for your sister…hmm…rather our sister.’

’Yeah, I am sure she will love them.’

‘So who all will be there?’

‘How many times do I need to tell you? My sister’s and cousin’s family.’

‘Will your sister tie rakhi to me as well?’

‘Please don’t ask such stupid questions. You have already met them.’

‘Yeah. But that was almost two years back. I doubt whether they even remember me.’

‘They know you well. I keep talking to them about you .’

‘Well, knowing and remembering are two different things.’

It was a smooth ride from Noida to Gurgaon and after an hour’s journey the car stopped outside a swanky high-rise apartment at DLF Phase 3 in Gurgaon. He glanced rather nervously at building. They took lift to the 14th floor.

‘Come on they know about us. No one will say anything to you. They are educated.’

‘I wonder how I should address them…or rather how will they address me.’

He rang the doorbell of the apartment 1401. His cousin opened the door and suddenly the house was filled with cheers, laughter and greetings. His sister lovingly scolded him for being late. And then the festivities began. His sister did puja and then tied rakhi to him and his cousin. He stood alone in a corner of the room trying to hide the gift he brought. He could not gather courage to be part of the celebrations. No one greeted him. No one said anything to him. After a while they looked at each other and smiled sadly. They were out but were neither accepted nor acknowledged.

Posted by Kumar in By Author, By Genre, By Language, By Title, English, Fiction, 1 comment

Purple

He was very happy as his exams for class five were over. He will now go to his maternal grandmother’s home for summer vacations. For him it was his favorite place and his whole world. After all he was pampered by one and all – his cousins, his aunts, his uncles and of course his grandmother. His mother always complained, though smiling, ‘My mother loves spoiling you ’. Though his father never approved his stay there but his mother always managed to convince him.

Reaching Udaipur, he was greeted enthusiastically by everyone especially his grandmother who bombarded him with kisses. He felt like a prince. He was so happy, all grinning, laughing. That evening they decided to go to market for shopping. His aunt said, ‘Now that you are grown-up you will do your shopping yourself.’ He was overjoyed as now he could choose what to wear. After all he is grown-up now.

After shopping, everyone surround the matriarch showing all they bought. He too excitedly showed his T-Shirt, holding it in his tiny hands and beaming with pride. His grandmother looked at it and mocked, ‘You bought this. I can’t believe. This is so feminine. You are a boy, stop this girlish behavior. Look at the color of this T-Shirt. How can you choose such a color’? Everyone laughed loudly. With teary eyes he looked around for support and affirmation for his choice but alas even his mom was laughing. At that moment how much he hated himself. Purple was his favorite color.

Posted by Kumar in By Author, By Genre, By Language, By Title, English, Fiction, 16 comments