Hindi

अर्धनारीश्वर

अर्धनारीश्वर
बचपन में देखा था पहली बार l
मानो पुरुष ने किया नारी शृंगार ll
पूछा मैंने मां, से यह कौन खड़े हैं द्वारा?
मां बोली, पूर्व जन्म के पापों से l
बेटा, किन्नर है सारे ll
हर जन्म पे जो बधाई बजाते l
क्यों मां, हम उन्हें नहीं अपनाते ll
जब ईश्वर सदा पूर्ण कहलाए l
तो उसकी रचना अधूरी क्यों मानी जाए ll
सुन समाज कहता में डंके की चोट पर l
हा सत्य, सत्य है मेरा हर एक एक अक्षर ll
अगर पूर्ण है तेरा जगदीश्वर l
तो संपूर्ण है उसकी रचना अर्धनारीश्वर ll
– रित्विक

Posted by Ritwik in By Author, By Genre, By Language, By Title, Hindi, Poem / Poetry, 2 comments

ग्लानि – Part 1

आज वो बहुत परेशान था। उसे बार बार वो दिन याद आ रहा था जब वो गीता से शादी कर अपनी एक नयी दुनिया बनायी थी। लेकिन आज उनके तलाक़ की सुनवाई होने जा रही है। आख़िर इन तीन सालों में ऐसा क्या हो गया जो ये नौबत आ गयी। वो आज भी गीता से उतना ही प्यार करता है। अफ़सोस…

‘श्याम श्याम’ पापा आवाज़ लगते हुए घर में आए। मैं अपने कमरे से बाहर आया। पापा बहुत ख़ुश दिख रहे थे – उन्होंने मेरे सामने एक तस्वीर रख दी। ‘देख कितना अच्छा रिश्ता आया है। लड़की का नाम गीता है और वो एक एरहोस्टिस है।’ मैंने धीरे से फ़ोटो उठायी। गीता बहुत ही सुंदर थी। ख़ासतौर से उसकी आँखें जो हिरन जैसी ख़ूबसूरत थीं। मैंने अपनी ख़ुशी छुपाते हुए सिर्फ़ अपनी गर्दन ऐसे हिलायी मानो अभी मुझे शादी न करनी हो।

तभी रसोई से कल्याणी बाहर आयी। वैसे तो कल्याणी मेरे माँ समान थीं। वो मेरे पिता की दूसरी बीवी थी। वो पिता जी से उम्र में बहुत छोटी थीं। जब मेरे पिता ने उनसे शादी की थी तब मुझे बड़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था। स्कूल में तो मेरा जीना मुश्किल हो गया था। ‘तेरे पापा ने तो मस्त माल घर लाए हैं, कभी हमें भी मौक़ा दो, तुम्हारे पापा तो बहुत ऊँची चीज़ निकले, जैसी भद्दी बातें सुन कर मेरा मन बहुत दुखी हो जाता था। सारा दिन पापा को कोसता रहता और कल्याणी को भी जी भर के गालियाँ देता। उसे कभी माँ का दर्जा ना दे सका। पापा की दूसरी शादी की वजह से रिश्तेदार और मोहल्ले वाले धीरे धीरे हमसे दूरी बढ़ा ली। मैं बाहर खेलने जाना भी कम कर दिया था। लोगों से डर लगने लगा। मेरा आत्मविश्वास, मेरी हँसी, मेरा चहकना सब बंद हो गया था। पढ़ाई में भी मन नहीं लगता। मेरे ग्रेड्ज़ गिर गए। पापा परेशान हुए। कल्याणी से बात करके मुझे हॉस्टल में भेजने का फ़ैसला किया। मुझे पापा से दूर भेजने की साज़िश कल्याणी की ही थी। मुझे उससे बहुत चिढ़ हो गयी थी। अगर वो मुझसे बात करने की कोशिश करती तो मैं छिड़क देता। उसके किसी भी बात का ठीक से जवाब नहीं देता। लेकिन कभी कभी मैं उसको छुप करके देखता था। ग़ज़ब का सौंदर्य था उसका। उसकी आँखें, उसकी मुस्कुराहट, उसकी होंठ – ऐसा लगता था मानो वही मेनका है। मेरे पापा को अपने जाल में फँसना उसका मक़सद था। बावजूद इसके मेरे मन में ख़्याल आता की मैं भी इतनी ख़ूबसूरत औरत से शादी करूँगा।

To be continued

Posted by Yadavendra Singh in By Author, By Genre, By Language, By Title, Fiction, Hindi, 0 comments

हमारी अधूरी कहानी

*हमारी अधूरी कहानी*
जवानी की दहलीज पर कदम पड़े ही थे l जिंदगी भी अजीब कश्मकश के दौर से गुजर रही थी l रह रह कर अपने ही अंदर सवालों के सैलाब उमड़ रहे थे, अजीब सा डर, अजीब सी बेचैनी थी l जहां क्लास के सभी साथी अब जोड़ियों में बटने लगे थे, फ्रेंडशिप डे के बजाय वैलेंटाइंस डे का इंतजार करने लगे थे, वही में खुद को खुद में ढूंढ रहा था l
मुझे हमेशा से ही बात पता थी कि मैं औरों उसे कुछ अलग हूं lपर अब उस अलग की परिभाषा समझ आने लगी थीl मेरा आकर्षण लड़कियों के बजाय लड़कों में था l
कुछ समझ नहीं आ रहा था खुद से कभी कभी घृणा सी होने लगती थी, मन ही मन ऊपर वाले को याद किया करता था और अपने आप को ठीक कर देने को कहता था l उन्हीं दिनों दिल्ली में आयोजित प्राइड वॉक के विषय में जानने को मिला, तब पता चला दुनिया में मैं अकेला नहीं समाज में मेरे जैसे हजारों लोग हैं, और यह लोग अलग नहीं बिल्कुल साधारण है हर साधारण व्यक्ति की तरह l अब मन कुछ शांत था, मानो तूफान से लड़ती हुई नौका को किनारा मिल चुका हो l अब मन सपने बुनने लगा था l
कुछ डेढ़ दो महीने बाद विद्यालय में वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित हुई, नियमानुसार प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र को नेशनल लेवल वाद विवाद प्रतियोगिता के लिए चुना जाना था l आवाज तो मेरी हमेशा से ही अच्छी थी, विद्यालय स्तर पर वाद विवाद प्रतियोगिता जितना मेरे लिए कोई मुश्किल नहीं था l
और वह समय आया जब मेरा राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता के लिए दिल्ली आना हुआ l
‌अनेकों युवाओं के बीच उस परिसर में मेरी नजर पड़ी मिश्रा जी पर जो लकड़ी की कुर्सी पर बैठ कर सबके लिए कमरे निर्धारित कर रहे थे, अपने कमरे का पता लेकर मैं सीधे पहुंचा अपने कमरे की ओर किसी भी बात का पूर्वानुमान ना होने के कारण झटके से दरवाजा खोलते हुए में अंदर दाखिल हुआ और एकदम स्तब्ध रह गया l मेरे सामने खड़ा था एक लंबा, आजान बाहु गेहुआ वर्ण तथा चमकीली आंखों वाला एक नवयुवक, तभी आवाज आई और मेरा ध्यान भंग हुआ, मेरी ओर हाथ बढ़ाते हुए उसने कहा, मेरा नाम है अथर्व मैं अंबाला का रहने वाला हूं, फिर एक छोटी सी हंसी हंसकर बोला अब 7 दिन तक तुमको परेशान करने आया हूं, मुझे भी यही कमरा मिला है l उसकी इस बात पर हम दोनों ही हंस पड़े और शुरु हुआ एक नई दोस्ती का रिश्ता…..
‌ देखते देखते 2 दिन बीते, मेरे मन में उसके लिए अजीब सी बेचैनी थी, उसका साथ मुझे अच्छा लग रहा था l उस दिन रात्रि भोजन के बाद हम दोनों वापस अपने कमरे में आए, उस दिन भारत और पाकिस्तान का मैच था l अथर्व की मैच में काफी रुचि थी वह कमरे में घुसते ही अपने मोबाइल पर लाइव मैच लगाकर बैठ गया l कुछ देर बीता ही था की वह मेरी तरफ देखा और बोला, ” मैच रोमांचक हो चला है, तुम देखना पसंद करोगे?” मेरी बचपन से खेलकूद में कोई रुचि नहीं रही पर मानो उसकी खुशी के लिए मेरा सर अपने आप ही हां कर गया l
मेरे हां भर की देरी थी कि वह आकर मेरे बगल में लेट गया l उसका शरीर मेरे शरीर से छूते ही मेरा माथा पसीने से तरबतर हो गया, जहां एक तरफ उसकी आंखें मोबाइल के स्क्रीन की ओर अपलक देख रही थी वही मेरी निगाहें एक टक उसके चेहरे की ओर देख रहे थे l दिल मानो धड़कनों में यह दुआएं कर रहा था की घड़ी का कांटा हमेशा के लिए यूंही रुक जाए और यह करीबी कभी दूरी ना बने l
तभी अचानक उसकी नजर, उसको देखते हुए मेरी नजरों पर पड़ी, मैं सहम उठा पलकें झुक गई, धड़कन है मानो मानो तीव्र गति से धड़कने लगी l वह शायद अब समझ चुका था कि मेरे दिल में उसके लिए कुछ था l
उसने फोन को बंद कर के बगल में रख दिया l
और मुझे जकड़ लिया अपनी बाहों में, और यूं ही हम रात भर एक दूसरे में डूबते चले गए l अधरपल्लव के रसास्वादन से अगले दिन की शुरुआत भी मीठी ही रही l
जागती हुई आंखें हजारों सपने देखने लगी l
यूं ही 7 दिन का सफर खत्म हो चला था, अश्रुपूर्ण आंखों को समझाते हुए अब विदा लेनी थी l
‌ मैं अथर्व के पास गया और उसे ज़ोर से गले लगा लिया l इस समय को मैं खत्म होने नहीं देना चाहता था l कि तभी अचानक मुझे पीछे धकेलते हुए, वह बोला कि मैं ऐसा बर्ताव कर रहा हूं जैसे कि उसकी पत्नी यां प्रेमिका हो l मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही उसके शब्द यह जता चुके थे कि पिछले 4 दिनों में मेरे साथ बिताया हुआ समय उसके जीवन में कोई अहमियत नहीं रखते और वह मात्र शारीरिक सुखों को भोगने के लिए था मैं मौन खड़ा सब सुनता रहा l
‌ अपनी बात कहकर व चल चल पड़ा, अब हमारे रास्ते अलग हो चुके थे l उसके कमरे से निकलते ही, मेरा भी उस कमरे में दम घुटने सा लगा उसके साथ बिताए हुए पल उस कमरे की यादें आंखों के सामने घूमने लगी l मैं घर लौट आया आज इस बात को 7 साल 4 महीने 17 दिन हो चुके हैं पर आज भी मेरा दिल अपने उस पहले प्यार की पहली याद को संजोए बैठा है l कितना मुश्किल है भुला पाना, की अधूरी है मेरी प्रेम कहानी l और ना जाने हम जैसे लोगों के जीवन में ऐसी कितनी ही अधूरी कहानियां होती हैं जो दिल के कोनों में हमेशा के लिए दबी रहती हैं l
समझते अगर हमें भी प्यार के काबिल तुम तो जान पाते किस कदर चाहते थे तुम्हें l पर जाओ आजाद हो तुम बार बार हमारा दिल तोड़ने के लिए, बार-बार हमारे करीब आकर हमसे दूर जाने के लिए l क्योंकि हमने भी समझौता कर लिया अपनी अधूरी कहानी से l
– रित्विक

Posted by Ritwik in By Author, By Genre, By Language, By Title, Fiction, Hindi, 4 comments

मेरा कसूर क्या है ?

बात उन दिनों की है जब समलैंगिक होना सिर्फ उसे ही ज्ञात होता था जो स्वयं समलैंगिक हो उस समय का परिदृश्य आज जैसा नहीं था, जैसे आज अनेक संचार माध्यमों द्वारा हम एवं सभी शिक्षित एवं अशिक्षित लोग इस बात को जानते हैं, कि समलैंगिक होना क्या है परंतु उस समय मेरे घर में कोई सदस्य समलैंगिक है इस बात को कोई स्वीकार करना नहीं चाहता था ना ही उसके बारे में कोई वार्तालाप होता था.

गर्मी की छुट्टियां चल रही थी दसवीं की परीक्षा के उपरांत रोहन ने अपने मित्र अनिकेत को भोजन के लिए आमंत्रित किया था, रोहन के मन में अनिकेत के प्रति एक विशेष आकर्षण था शायद रोहन मन ही मन अनिकेत से प्यार करने लगा था, परंतु अनिकेत इस बात से अनभिज्ञ था जिस दिन रोहन ने अनिकेत को भोजन करने आमंत्रित किया था उस दिन घर पर रोहन के पिता जी भी थे रोहन की माता ऑफिस गई हुई थी परंतु जाने के पूर्व रोहन ने अपनी माता से पूरा भोजन बनवा लिया था परंतु रोहन ने अपने हाथों से अनिकेत के लिए विशेष हलवा बनाया था रोहन सुबह से ही सजने सवरने में लगा था अनिकेत के आने में अभी एक घंटा शेष था ,रोहन मुल्तानी मिट्टी का लेप लगाकर बैठा हुआ था उसके पिताजी रोहन की खुशी देख कर कुछ अनुमान लगा रहे थे, मिट्टी सूखने पर रोहन जो बाथरूम की तरफ बढ़ कर जा रहा था तभी उसके पिता जी नाक भौं सिकोड़ कर बोले “रोहन इतने सजने सवरने की क्या जरूरत है? अगर जो मैं सोच रहा हूं वह बात सही निकली तो मैं तुम्हें भी मार डालूंगा और खुद भी मर जाऊंगा” रोहन ने उस बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी पर उसका दिल जोरो से धड़कने लगा आसु आंखो में आ गए पर छलके नहीं चेहरा धोते हुए बस मन ही मन रोहन सोच रहा था

मेरा कसूर क्या है ?

Posted by Anand Rege in By Author, By Genre, By Language, By Title, Hindi, Non Fiction, 5 comments

मानव हूंं मैं कोई अमानव नहीं

 

      मानव हूंं मैं कोइ अमानव नहीं

सोचा है आज जो पहले नहींं
बेचैनी है आज पर डर नहीं
दिल में है पहचान जो बाहर नहीं
मानव हूंं मैं कोइ अमानव नहीं

हाथों में है साड़ी, पतलून नहीं
चेहरे पे है खुशी, कोई गम नहीं
देखा है ख़ुद को आज, कोई परछाईं नहीं
मानव हूंं मैं कोई अमानव नहीं

चूड़ियां हैं हाथ में, समाज की बेड़ियां नहीं
पाज़ेब हैं पैरों में, कोई जंजीर नहीं
बदलनी है अब सोच, खुद को नहीं
मानव हूंं मैं कोइ अमानव नहीं

माथे पर है बिंदी, शिकस्त कि लकीरें नहीं
कानों में हैं झुमके, तानों कि आवाज़ नहीं
खुद से खुश हूं, तुमसे नाराज़ भी नहीं
मानव हूंं मैं कोइ अमानव नहीं

आज कंधे पर है पल्लू, कोई बोझ नहीं
बाल हैं लम्बे, परेशानियां नहीं
चेहरे पे श्रृंगार, कोई मुखौटा नहीं
हांं मानव हूंं मैं कोइ अमानव नहीं

तालीयां नहीं अब सोच है बदलनी
यह शुरुवात है ख़ुद से तुमसे नहीं
निकल रहा हूं बाहर अब घबराना नहीं
अपनालो हमें अब, फिर ठुकराना नहीं

तुम जैसा ही तो मानव हूंं
कोई अमानव नहीं।

– समय सिंह ठाकुर

Posted by Samay Singh in By Author, By Title, Hindi, Poem / Poetry, 5 comments